बालन द बॉय रिव्यू – मां-बेटे की अनोखी कहानी
बालन द बॉय रिव्यू – मां-बेटे की अनोखी कहानी
कहानी
UNN @ Varsha Parikh : फिल्म की कहानी का ताना-बाना एक मां और उसके बेटे के इर्द-गिर्द बुना गया है. कहानी की शुरुआत ही एक गहरे सस्पेंस के साथ होती है. एक प्रेग्नेंट मां जुर्म की सजा काट रही है. जेल की काल कोठरी में ही उसके बच्चे का जन्म होता है. सजा पूरी होने के बाद जब ये औरत अपने मासूम बेटे के साथ बाहर की दुनिया में कदम रखती है, तो जाहिर सी बात है कि जिंदगी उनके लिए फूलों की सेज तो नहीं बिछाएगी. समाज के तीखे तीरों और अपने अतीत से बचने के लिए यह मां-बेटा लगातार अपनी पहचान बदलते रहते हैं, एक शहर से दूसरे शहर भागते रहते हैं.
भागमभाग की इसी जिंदगी के बीच, इस मां को एक गांव के इलाके में एक बुजुर्ग महिला की देखरेख करने का काम मिलता है. कुछ समय के लिए ऐसा लगता है कि आखिरकार इस भटकती हुई मां और बेटे को एक सुकून का आशियाना, एक सेफ स्पेस मिल गया है. दोनों वहां राहत की सांस लेते हैं, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. वहां कुछ ऐसा घटता है जो उन दोनों की जिंदगी को पूरी तरह से उलट-पुलट कर रख देता है. आखिर वहां क्या हुआ था और उस हादसे ने इन दोनों की जिंदगी को किस तरह से बदला? ये जानने के लिए आपको थियेटर में जाकर बालन देखनी होगी.
एक दर्शक के तौर पर हम इस कहानी में बिल्कुल बीच से एंट्री करते हैं. शुरुआत में हम सिर्फ यह देखते हैं कि ये मां-बेटा किसी अनजान डर से लगातार भागे जा रहे हैं और हमारे अंदर यह जानने की उत्सुकता जागती है कि आखिर वो कौन सी बात है जो इन्हें एक सुरक्षित दिखने वाली जगह से भी भागने पर मजबूर कर रही है. जब हमें लगता है कि यह फिल्म सिर्फ उनके इसी सफर के बारे में होने वाली है, तभी डायरेक्टर कहानी में एक ऐसा तगड़ा झटका देते हैं कि पूरी फिल्म एक अलग ही दिशा में मुड़ जाती है. इसके बाद फिल्म पूरी तरह से एक कैरेक्टर स्टडी बन जाती है. एक पल के लिए आपको लग सकता है कि फिल्म अपनी मुख्य पटरी से उतरकर कहीं और जा रही है, लेकिन यही चिदंबरम की असली खूबी है. वो जानबूझकर हमें घुमाते हैं ताकि फिल्म का आखिरी क्लाइमेक्स दस गुना ज्यादा ताकतवर बन जाए.
चिदंबरम के निर्देशन की सबसे बड़ी जीत यह है कि वो जानते हैं कि किसी किरदार द्वारा कही गई एक बेहद साधारण सी लाइन में कितनी गहरी परतें जोड़ी जा सकती हैं. फिल्म के शुरुआती हिस्से में एक डायलॉग आता है, जिसकी अहमियत हमें उसी वक्त समझ आ जाती है. लेकिन मेकर्स इसके बाद कहानी को एक अलग ट्रैक पर ले जाते हैं, जिससे दर्शक उस बात को थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं और फिर, जब क्लाइमेक्स में वही बात एक बड़े खुलासे के रूप में वापस सामने आती है, तो थिएटर के अंदर एक ऐसा सिनेमाई यूफोरिया पैदा होता है.
