मध्यप्रदेश : प्रदेश के 40% जंगलों को निजी हाथों में सौंपने की कवायत तेज - Update Now News

मध्यप्रदेश : प्रदेश के 40% जंगलों को निजी हाथों में सौंपने की कवायत तेज

मध्यप्रदेश : प्रदेश के 40% जंगलों को निजी हाथों में सौंपने की कवायत तेज

– 2021 में इसी मुद्दे पर शिवराज सरकार बैकफुट आ गई थी
– योजना का मास्टरमाइंड इंदौर का एक कारोबारी
– पर्यावरण सुधरने की कोई उम्मीद नहीं
भोपाल । भारत सरकार हो या राज्य सरकारें, हर वक्त उनका एक ही नारा होता है आदिवासियों का कल्याण। लेकिन उनका कल्याण करते-करते ये सरकारें अकसर उनको उनके जंगलों से बेदखल कर देती हैं। इसका ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश का है। प्रदेश के 40% जंगलों को निजी हाथों में सौंपने जा रही है। गौरतलब है कि 2021 में तत्कालीन शिवराज सरकार इसी मुद्दे पर बैकफुट पर आ गई थी। दिलचस्प पहलू यह है कि 2021 और वर्तमान में इस योजना का अमलीजामा पहनाने की कोशिश करने वाले नौकरशाह एक ही हैं। यानि 2021 में अशोक वर्णवाल प्रमुख सचिव थे और अब वे एसीएस हैं। हालांकि पर्यावरणविद इसका विरोध करने में मुखर हो रहे हैं। सूत्रों की माने तो इस योजना के ड्राफ्ट लिखने का मास्टरमाइंड इंदौर का एक कारोबारी है, जो एसीएस का करीबी माना जाता हैं।
राज्य के जंगलों की परिस्थितिकी में सुधार करने और आदिवासियों की आजीविका को सुदृढ़ करने के नाम पर राज्य के कुल 94,689 लाख हैक्टेयर वन क्षेत्र में से 37,420 लाख हैक्टेयर क्षेत्र को निजी कंपनियों को देने का निर्णय लिया गया है। इसमें छोटे निवेशकों को कम से कम 10 हेक्टेयर और बड़े निवेशकों को 1000 हेक्टेयर तक की जमीन पर जंगल विकसित करने के लिए आमंत्रित किया गया है। योजना के अनुसार एक कंपनी, संस्था, व्यक्ति या स्वयंसेवी संस्था को 10 हेक्टेयर तक का बिगड़ा जंगल दिया जाएगा। ये जंगल का हिस्सा अगले 60 सालों तक निजी हाथों में रहेगा। राज्य सरकार के वन विभाग और जिसे जंगल दिया जा रहा है उसके बीच में एक अनुबंध होगा। इस अनुबंध के तहत अनुबंध के पहले ही साल में जंगल सुधारने की गतिविधि शुरू करनी होगी। वन भूमि का इस्तेमाल दूसरे किसी काम में नहीं किया जाएगा। वन विभाग की सहमति से इस पूरे इलाके में पौधे लगाने होंगे। यदि 2 साल के भीतर पौधे नजर नहीं आएंगे तो अनुबंध रद्द भी किया जा सकता है।
– सीएसआर फंड का इस्तेमाल
राज्य सरकार ने अपनी नीति में लिखा है कि इन जंगलों को फिर से हरा भरा करने के लिए बड़ी कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी और कॉर्पोरेट एनवायरमेंटल रिस्पांसिबिलिटी के फंड का इस्तेमाल किया जाएग। दरअसल बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को इन दोनों मदों में अपनी कुल कमाई का 3% देना होता है।
– कार्बन क्रेडिट संस्था के खाते में
वन उपज वन विभाग के माध्यम से बेची जाएगी हालांकि इसका आधा फायदा उस संस्था को भी दिया जाएगा, जिसने इस जंगल को विकसित किया है। वहीं दूसरी तरफ निजी कंपनी या संस्था को कार्बन क्रेडिट का मुनाफा मिलेगा। पर्यावरण खराब करने वाली कंपनियों को कार्बन क्रेडिट बढ़ाने की जिम्मेदारी है। सीधी जिले के पूर्व वन अधिकारी चंद्रभान पांडेय बताते हैं कि कैसे आदिवासी कार्बन व्यापार की जटिलता को समझकर कार्बन भाव-ताव को समझेगा? वह कहते हैं कि कार्बन व्यापार के जरिए (वनीकरण करके) अन्तराष्ट्रीय बाजार से करोड़ों रुपए कमाना ही एकमात्र उद्देश्य निजी क्षेत्र का होगा। वह कहते हैं कि अंत में स्थानीय समुदाय अपने निस्तारी जंगलों से बेदखल हो जाएगा और शहरों में आकर मजूरी कर स्लम बस्तियों की संख्या बढ़ाएगा। एक तरह से सरकार ही अपनी नीतियों के माध्यम से आदिवासियों को उनकी जमीन से विस्थापित कर किसान से मजदूर बनने पर मजबूर कर रही है।
-वन विकास निगम को बनाया नोडल एजेंसी
फॉरेस्ट एक्ट की जटिलताओं के चलते बिगड़े वन क्षेत्र निजी हाथों को नहीं दिया जा सकता है। इसी वजह से एसीएस फारेस्ट ने वन विकास निगम को नोडल एजेंसी बनाया है। यही नहीं, सूत्र बताते है की अपने मंसूबे को पूरा करने के लिए एसीएस वर्णवाल रिटायर्ड आईएफएस अधिकारी यूके सुबुद्धि को अत्यंत गोपनीय तरीके से सलाहकार बनाने जा रहे है। जबकि सुबुद्धि के 2019 में लोकायुक्त में विभिन्न धाराओं में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और 420 का मुकदमा दर्ज है। यहां यह उल्लेख किया जाना उचित होगा कि बांस मिशन की एक योजना के तहत जिस एनआईआर देव मुख़र्जी ने किसानों को ठगा वह भी एसीएस और यूके सुबुद्धि का खास था। यह महज सहयोग है अथवा इत्तेफाक कि निजी हाथों को बिगड़े वन देने की वकालत करने वाला इंदौर का बड़ा कारोबारी भी वर्णवाल और सुबुद्धि का नजदीकी है।
-क्या कहते है पर्यावरणविद
पर्यावरणविद् और वन प्रबंधन के जानकार जयंत वर्मा का कहना है कि इस नीति में कई लूप पोल हैं। सरकार जिस जमीन को निजी हाथों में देने जा रही है उसके निजीकरण के पहले केंद्र सरकार से अनुमति लेनी होगी क्योंकि वन भूमि केंद्र का मामला है। इसमें राज्य सरकार अपने मन से कुछ नहीं कर सकती। निजी कंपनियों को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि पर्यावरण सुधरे या वनों की स्थिति सुधरे या फिर उसे क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों का भला हो। निजी कंपनियां तो अपना भला देखेंगी और वह ऐसे पेड़ पौधों का उत्पादन करेंगी, जिनसे ज्यादा मुनाफा होगा। इससे हो सकता है कि वन उपज बढ़ जाए लेकिन पर्यावरण सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है।
भोपाल के पर्यावरणविद सुभाष पांडेय कहना है कि राज्य के आधे से अधिक बिगड़े वन क्षेत्र को सुधारने के लिए जंगलों की जिस क्षेत्र को अधिसूचित किया गया है, वास्तव में वहां आदिवासियों के घर-द्वार, खेत और चारागाह हैं। इसे राज्य सरकार बिगड़े वन क्षेत्र की संज्ञा दे कर निजी क्षेत्रों को सौंपने जा रही है।

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