PM Modi may make a brief stopover in the UAE while traveling

यूरोप जाते समय यूएई में थोड़ी देर रुक सकते हैं पीएम मोदी

यूरोप जाते समय यूएई में थोड़ी देर रुक सकते हैं पीएम मोदी

पश्चिम एशिया में होने वाला है बड़ा खेल

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले माह नॉर्वे में आयोजित भारत नॉर्डिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए यूरोप यात्रा पर जा रहे हैं और तभी उनके संयुक्त अरब अमीरात में संक्षिप्त लेकिन बहुत महत्वपूर्ण ठहराव की संभावना जाहिर की गई है। यह प्रस्तावित ठहराव पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका ईरान संघर्षविराम के बीच भारत की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका का संकेत देता है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी की यूएई यात्रा अभी अंतिम रूप में तय नहीं हुई है, लेकिन इस पर गंभीर चर्चा चल रही है। हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी यूएई का दौरा करके आये हैं और बताया जा रहा हैं कि उन्होंने वहां प्रधानमंत्री मोदी की संक्षिप्त यात्रा कार्यक्रम को अंतिम रूप दे दिया है, जिसकी घोषणा जल्द होगी।
बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा नॉर्वे के ओस्लो में होने वाले भारत नॉर्डिक सम्मेलन से शुरू होगा, जिसके बाद उनका कार्यक्रम नीदरलैंड, स्वीडन और इटली जाने का भी है। यदि यूएई में उनका ठहराव तय होता है, तब यह खाड़ी क्षेत्र में भारतीय रणनीतिक साझेदारी को बेहतर करेगा। बता दें कि संभावित यात्रा का समय अत्यंत संवेदनशील है। इस समय में प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक सक्रियता क्षेत्रीय स्थिरता में अहम रोल निभा सकती है। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नहयान से बातचीत कर क्षेत्रीय संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा कर चुके हैं। ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह दौरा भारत के लिए महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति मार्ग प्रभावित हो रहे हैं, इसके बाद भारत वैकल्पिक आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। यूएई के साथ हाल में हुए गैस समझौते और आर्थिक गलियारे पर चर्चा इस दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है। खाड़ी देशों में बसे लाखों भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना मोदी सरकार की प्राथमिकता है। इसके साथ ही भारत और यूएई के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति संभव है।
दूसरी ओर, भारत नॉर्डिक सम्मेलन पूरे दौरे का प्रमुख केंद्र है। यह एक अनूठा मंच है जहां भारत नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड के नेताओं के साथ सामूहिक संवाद करता है। यह सम्मेलन पहले 2018 में स्टॉकहोम और 2022 में कोपेनहेगन में आयोजित हो चुका है, जबकि तीसरा सम्मेलन मई 2026 में ओस्लो में प्रस्तावित है। इस सम्मेलन का दायरा अत्यंत व्यापक है। इसमें हरित प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल नवाचार, समुद्री अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा जैसे विषय शामिल हैं।
भारत और नॉर्डिक देशों के संबंध रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह साझेदारी तकनीकी विशेषज्ञता और आर्थिक विस्तार का अद्भुत संगम है। हरित ऊर्जा, ब्लू अर्थव्यवस्था और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों पक्षों का सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। आर्कटिक क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान और जलवायु अध्ययन भी इस साझेदारी को नई गहराई प्रदान करते हैं। बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्डिक नीति नवाचार और स्थिरता पर आधारित है। यह केवल एक क्षेत्रीय पहल नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रयोगशाला की तरह है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यहां विकसित मॉडल अन्य देशों के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं। साथ ही भारी उद्योगों के प्रदूषण को कम करने के प्रयास वैश्विक स्तर पर नई दिशा दे सकते हैं। इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग से वैश्विक व्यापार मार्गों में बदलाव संभव है।

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Date : 01 May 2026 Posted By : EDITOR
यूरोप जाते समय यूएई में थोड़ी देर रुक सकते हैं पीएम मोदी
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यूरोप जाते समय यूएई में थोड़ी देर रुक सकते हैं पीएम मोदी

पश्चिम एशिया में होने वाला है बड़ा खेल

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले माह नॉर्वे में आयोजित भारत नॉर्डिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए यूरोप यात्रा पर जा रहे हैं और तभी उनके संयुक्त अरब अमीरात में संक्षिप्त लेकिन बहुत महत्वपूर्ण ठहराव की संभावना जाहिर की गई है। यह प्रस्तावित ठहराव पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका ईरान संघर्षविराम के बीच भारत की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका का संकेत देता है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी की यूएई यात्रा अभी अंतिम रूप में तय नहीं हुई है, लेकिन इस पर गंभीर चर्चा चल रही है। हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी यूएई का दौरा करके आये हैं और बताया जा रहा हैं कि उन्होंने वहां प्रधानमंत्री मोदी की संक्षिप्त यात्रा कार्यक्रम को अंतिम रूप दे दिया है, जिसकी घोषणा जल्द होगी।
बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा नॉर्वे के ओस्लो में होने वाले भारत नॉर्डिक सम्मेलन से शुरू होगा, जिसके बाद उनका कार्यक्रम नीदरलैंड, स्वीडन और इटली जाने का भी है। यदि यूएई में उनका ठहराव तय होता है, तब यह खाड़ी क्षेत्र में भारतीय रणनीतिक साझेदारी को बेहतर करेगा। बता दें कि संभावित यात्रा का समय अत्यंत संवेदनशील है। इस समय में प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक सक्रियता क्षेत्रीय स्थिरता में अहम रोल निभा सकती है। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नहयान से बातचीत कर क्षेत्रीय संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा कर चुके हैं। ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह दौरा भारत के लिए महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति मार्ग प्रभावित हो रहे हैं, इसके बाद भारत वैकल्पिक आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। यूएई के साथ हाल में हुए गैस समझौते और आर्थिक गलियारे पर चर्चा इस दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है। खाड़ी देशों में बसे लाखों भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना मोदी सरकार की प्राथमिकता है। इसके साथ ही भारत और यूएई के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति संभव है।
दूसरी ओर, भारत नॉर्डिक सम्मेलन पूरे दौरे का प्रमुख केंद्र है। यह एक अनूठा मंच है जहां भारत नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड के नेताओं के साथ सामूहिक संवाद करता है। यह सम्मेलन पहले 2018 में स्टॉकहोम और 2022 में कोपेनहेगन में आयोजित हो चुका है, जबकि तीसरा सम्मेलन मई 2026 में ओस्लो में प्रस्तावित है। इस सम्मेलन का दायरा अत्यंत व्यापक है। इसमें हरित प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल नवाचार, समुद्री अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा जैसे विषय शामिल हैं।
भारत और नॉर्डिक देशों के संबंध रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह साझेदारी तकनीकी विशेषज्ञता और आर्थिक विस्तार का अद्भुत संगम है। हरित ऊर्जा, ब्लू अर्थव्यवस्था और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों पक्षों का सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। आर्कटिक क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान और जलवायु अध्ययन भी इस साझेदारी को नई गहराई प्रदान करते हैं। बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्डिक नीति नवाचार और स्थिरता पर आधारित है। यह केवल एक क्षेत्रीय पहल नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रयोगशाला की तरह है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यहां विकसित मॉडल अन्य देशों के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं। साथ ही भारी उद्योगों के प्रदूषण को कम करने के प्रयास वैश्विक स्तर पर नई दिशा दे सकते हैं। इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग से वैश्विक व्यापार मार्गों में बदलाव संभव है।

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