RSS chief Mohan Bhagwat said that religion works to unite and

संघ प्रमुख मोहन भागवत बोले: “धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं”

संघ प्रमुख मोहन भागवत बोले: “धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं”

जेतलपुर स्वामिनारायण मंदिर के द्विशताब्दी महोत्सव में दिया एकता, धर्म और राष्ट्रहित का संदेश

अहमदाबाद | शहर के निकट स्थित जेतलपुर स्वामिनारायण मंदिर में भगवान स्वामिनारायण के आगमन के 200 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में भव्य द्विशताब्दी महोत्सव का आयोजन किया गया। यह महोत्सव आचार्य प.पू. 108 व्रजेन्द्रप्रसादजी महाराज की अध्यक्षता में आयोजित हुआ, जिसमें देशभर से संत-महंतों और हजारों हरिभक्तों ने भाग लिया। द्विशताब्दी महोत्सव के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत विशेष रूप से उपस्थित रहे। उनके साथ नरनारायणदेव गादी के पीठाधीपति प.पू. ध.धू. 1008 आचार्य कोशलेन्द्रप्रसादजी महाराज भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा, “हम जो कार्य पिछले 100 वर्षों से कर रहे हैं, वही कार्य स्वामिनारायण भगवान और उनका संप्रदाय पिछले 200 वर्षों से कर रहा है।” उन्होंने स्वयं को यहां ‘जूनियर’ के रूप में ‘सीनियर’ से मिलने आया हुआ बताया। उन्होंने कहा कि “जो धर्म का पालन करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। जीवन में उपासना और साधना अत्यंत आवश्यक है।” केवल सपने देखने से कुछ नहीं होता, बल्कि आचरण से ही परिवर्तन संभव है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि धर्म जोड़ने का कार्य करता है, तोड़ने का नहीं।
भागवत ने सामाजिक समरसता पर बल देते हुए कहा कि सभी मनुष्य ईश्वर की रचना हैं, फिर ऊंच-नीच का भेद कैसा? यदि हम इन मूल्यों को अपनाएं तो सनातन धर्म की रक्षा संभव है। उन्होंने कहा कि विश्व की अनेक समस्याओं का समाधान भारत के पास है और अंततः विश्व को मार्गदर्शन भारत से ही मिलेगा। अपने संबोधन में उन्होंने गुजरात में चल रही व्यसनमुक्ति और सेवा गतिविधियों की भी सराहना की। आध्यात्मिक संदर्भ में उन्होंने कहा, “ऐसा कोई अक्षर नहीं जिसका मंत्र में उपयोग न हुआ हो,” अर्थात सृष्टि के प्रत्येक अंश में दिव्यता विद्यमान है। उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि भले ही धर्म के मार्ग अलग-अलग हों, लेकिन सबका अंतिम लक्ष्य एक ही है—‘सनातन’। समाज और राष्ट्रहित में सभी को मिलकर आगे बढ़ना चाहिए।
इतिहास के अनुसार भगवान स्वामिनारायण ने स्वयं अपने हस्तों से कुल नौ मंदिरों की स्थापना की थी। इनमें पांचवें क्रम पर जेतलपुरधाम में उन्होंने रेवतीबलदेवजी और हरिकृष्ण महाराज की प्राणप्रतिष्ठा की थी। इसी ऐतिहासिक घटना के 200 वर्ष पूर्ण होने पर यह विराट आयोजन किया गया। महोत्सव को भव्य स्वरूप देने के लिए जेतलपुर में लगभग 500 विघा क्षेत्र में एक पूरा नगर बसाया गया है। 25 विघा क्षेत्र में विशाल धर्मशाला का निर्माण किया गया है, जबकि 50 विघा क्षेत्र में विभिन्न कार्यक्रमों के लिए 15 विशाल डोम तैयार किए गए हैं।

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