chandradev sharma owns four restaurants in singapore

पत्रकारिता छोड़कर वेटर बने, आज सिंगापुर (Singapore) में चार रेस्त्रां के मालिक हैं चंद्रदेव शर्मा

 

Singapore में अपनी मेहनत के दम पर चार रेस्टोरेंट के मालिक है चंद्रदेव शर्मा

वो कहते हैं न मेहनत के आगे सब कुछ आसान हो जाता है. जब किसी चीज को पाने की चाहत सच्चे मन से होती है, तो वह चीज अपने आप आपके पास चलकर आती है. कुछ ऐसी ही कहानी है, हजारीबाग के सुदूरवर्ती चूरचू गांव के रहने वाले चंद्रदेव शर्मा का. आज हम आपको चंद्रदेव की कहानी बताएंगे जिसने पत्रकारिता की नौकरी छोड़कर रेस्टोरेंट के मालिक बनने का सफर सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत के दम पर पाया.

हजारीबाग के सुदूरवर्ती चूरचू गांव के रहने वाले चंद्रदेव शर्मा ने. चंद्रदेव ने पत्रकारिता से अपने करियर की शुरुआत की, परिस्थितिवश उन्हें पत्रकारिता छोड़नी पड़ी. इसके बाद उन्होंने वेटर का काम किया और आज सिंगापुर में 4 रेस्त्रां के मालिक हैं. रेस्त्रां में सवा दो सौ लोगों को रोजगार दे रहे हैं.

Mumbai: 6 लाख का इन्वेस्ट कर पार्टनर बने चेन्नई की एक कंपनी ने चंद्रदेव को सिंगापुर भेजा. उन्हें रेस्त्रां को स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई. चंद्रदेव टूरिस्ट वीजा पर सिंगापुर गए और फिर वहां मालिक ने उनके व्यवहार और काम करने के तरीके को देखते हुए उन्हें नौकरी पर रख लिया. उन्हें 2 साल का वर्किंग वीजा भी दिलवा दिया. नौकरी करने के दौरान एक ग्राहक सुरेंद्र सिंह मिले और उसने रेस्त्रां चलाने का ही ऑफर दे दिया, उनका दो रेस्टोरेंट था. उन्होंने चंद्रदेव को पार्टनर में काम करने का ऑफर दिया. इसकी एवज में 50 लाख रुपए भी मांगे. लेकिन इतनी बड़ी रकम चंद्रदेव के पास नहीं थी. उसने कहा कि मेरे पास सिर्फ 6 लाख रुपए हैं. 6 लाख में उसने अपना पार्टनर बना लिया. बंद पड़े रेस्त्रां में उसने खूब मेहनत की. आलम यह हुआ है कि एक महीने में ही वह रेस्त्रां चलने लगा और कमाई भी शुरू हो गई. धीरे-धीरे चंद्रदेव चार रेस्टोरेंट के मालिक बन गए.चेन्नई में 6 महीने वेटर का काम कियाचंद्रदेव ने बताया कि चेन्नई में ओरिएंटल फ्रिजिग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के डायरेक्टर महादेवन की कंपनी में उन्होंने वेटर और किचन में करीब 6 महीने काम किया. इसी बीच मुंबई कैलाश पर्वत नामक रेस्टोरेंट का उद्घाटन और उसे स्थापित करने के लिए सिंगापुर जाना था. 6 साथियों के साथ वहां गए, 2 महीने का वीजा देकर सिंगापुर भेजा गया. लेकिन बेहतर काम के कारण 2 साल का वीजा दिया गया.

आज करोड़ों के मालिक चंद्रदेव
बताते हैं कि चेन्नई जाने के वक्त उनके पास महज 1500 रुपया था. लेकिन कड़ी मेहनत और किस्मत ने साथ दिया, धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलती गईं. साल 2011 में पहला तंदूरी कल्चर नाम का रेस्टोरेंट खोला. जिसमें 50 लोगों के बैठने की क्षमता थी. साल 2013 में दूसरी जगह उसी नाम से रेस्त्रां खोला, जिसमें 70 लोग बैठ सकते हैं. साल 2020 में 28 और 29 फरवरी को लगातार दो दिन उन्होंने दो अलग-अलग रेस्त्रां का उद्घाटन किया. पहले का नाम तंदूरी जायका रखा, जिसमें 70 लोग बैठ सकते हैं और दूसरे का नाम सलाम मुंबई, जिसमें 100 लोग बैठ सकते हैं.चंद्रदेव शर्मा का कहना है कि सिंगापुर सरकार के कुछ नियम है. उस नियम के अनुसार सात लोग पर एक भारतीय को ही नौकरी में रखा जा सकता है. वहां कोई भी भारतीय बिना पार्टनर के कारोबार नहीं कर सकता है. इस कारण अलग-अलग रेस्त्रां में अलग-अलग प्रतिशत पर पार्टनरशिप में रेस्त्रां खोला. उनका यह भी कहना है कि सिंगापुर में बेहतर कार्य के लिए 71वें गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रह्लाद मोदी के द्वारा इंटरनेशनल बिजनेस अवार्ड से नवाजा गया और उनके जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन है.
कोरोना से पहले लौटे थे, अब जाने की तैयारी
चंद्रदेव का कहना है कि कोरोना फैलने के पहले वो अपने परिवार से मिलने के लिए अपने गांव चूरचू पहुंचे. लेकिन संक्रमण फैलने के कारण वह वापस अभी तक नहीं जा सके हैं. उनका कहना है कि रेस्त्रां वहां अभी-भी चल रहा है. सरकार के नियम के अनुसार दो व्यक्ति को बैठाने की इजाजत है, पर धीरे-धीरे स्थिति सुधर रही है. कारोबार को घर से ही ऑनलाइन देखते हैं. वर्तमान समय में भी कमाई हो रही है. 15 सितंबर से वहां सबकुछ सामान्य हो जाएगा, ऐसे में अब जाने की तैयारी चल रही है ताकि फिर से कारोबार को तेजी दिया जा सके.
पूरी दुनिया में रेस्त्रां की चेन खोलने का सपना
चंद्रदेव की इच्छा है कि रेस्त्रां की एक चेन पूरी दुनिया में खोलें और उसमें भारतीय व्यंजन की प्रमुखता हो. उनका कहना है कि हाल के दिनों में हजारीबाग का प्रसिद्ध लिट्टी चोखा का स्वाद उन्होंने सिंगापुर के लोगों को चखाया है. धीरे-धीरे इच्छा है कि और भी ऊंचाई प्राप्त करें. लेकिन अपने देश के प्रति जिम्मेदारी भी पूरा करें. उनका यह भी कहना है जब भी कोई व्यक्ति हजारीबाग शहर का मिलता है तो उसका दिल खोलकर स्वागत करते हैं. यही नहीं भारतीय घूमने जाते हैं तो उन्हें भी वह मदद करते हैं. रहने खाने से लेकर घूमाने तक की व्यवस्था करवा देते हैं. उनका कहना है कि लाइफ में शॉर्टकट नाम का कोई शब्द नहीं है. कड़ी मेहनत करने से किस्मत भी साथ देती है और मुकाम भी मिलता है.

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