हैंडलूम – हमारी सांस्कृतिक धरोहर और कारीगरों की आजीविका का आधार – डॉ. दीप्ति सिंह हाड़ा
हैंडलूम – हमारी सांस्कृतिक धरोहर और कारीगरों की आजीविका का आधार – डॉ. दीप्ति सिंह हाड़ा
इंदौर। हर वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाने वाला नेशनल हैंडलूम डे न केवल भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं को सम्मानित करता है, बल्कि लाखों कारीगरों की मेहनत, रचनात्मकता और आजीविका का प्रतीक भी है। इस अवसर पर समाजसेवी डॉ. दीप्ति सिंह हाड़ा ने हैंडलूम और मधुबनी कला के संरक्षण और प्रोत्साहन का आह्वान किया। भारत का हस्तकरघा उद्योग विविधता और परंपरा का अनूठा मेल है। इसमें बनारसी, कांचीपुरम, इक्कत, पटोला जैसी प्रसिद्ध साड़ियों से लेकर मधुबनी पेंटिंग तक विभिन्न कला रूप शामिल हैं, जो न केवल देशभर में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति की पहचान बने हैं। हैंडलूम उत्पादों का पर्यावरण के प्रति मित्रवत होना भी इसे विशिष्ट बनाता है।

डॉ. दीप्ति सिंह हाड़ा ने कहा, “हैंडलूम केवल एक वस्त्र नहीं, एक भाव है – जिसमें हमारे कारीगरों की आत्मा बसती है। इस उद्योग को संरक्षण देना, केवल परंपरा को बचाना नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की जीविका को सहारा देना है। मधुबनी पेंटिंग, जो बिहार के मधुबनी जिले से उत्पन्न हुई है, आज हैंडलूम उत्पादों का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। देवताओं, प्रकृति और सामाजिक विषयों को दर्शाती यह कला जब वस्त्रों पर सजती है, तो परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम बन जाती है। इस अवसर पर डॉ. दीप्ति सिंह हाड़ा के साथ कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और विदुषियों ने भी अपने विचार रखे। इनमें शामिल थीं – श्रीमती सुरुचि मल्होत्रा, डॉ. नितिका बेंजामिन, डॉ. जयश्री तापड़िया, डॉ. पूजा मिश्रा,श्रीमती निविदा जैन, श्रीमती पलक, डॉ. संध्या चौकसे, श्रीमती शिखा काबरा लाहोटी इन सभी ने मिलकर यह संकल्प लिया कि स्थानीय कारीगरों और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए जनजागरूकता फैलायी जाएगी, हैंडलूम उत्पादों को प्राथमिकता दी जाएगी और युवाओं को पारंपरिक कारीगरी के प्रति प्रेरित किया जाएगा। नेशनल हैंडलूम डे केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक आंदोलन है – अपने गौरवशाली अतीत को सहेजने, कारीगरों को सम्मान देने और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का।
